Monday, 14 October 2013

अपना प्यारा गावं

महंगाई की देख दशा मन हुआ बहुत परेशान | 
अपने  प्रियवर से मै बोली सुनिए तो श्रीमान | 

छोड़ चमक दिल्ली की आओ लौटे अपने गॉव | 
यहाँ धूप  कंक्रीटो की वहां ठंडी नीम की छावं | 

मिटटी का वहां चूल्हा होगा और हांड़ी की भाजी | 
थैली  वाला दूध नहीं फल सब्जी होगी ताज़ी | 

गोमाता पालेंगे होगा दूध दही भरपूर | 
सदा जीवन होगा होंगे आडम्बर से दूर । 

अपने छोटे से आगन में फल सब्जिया उगायेंगे । 
लेकर सांस स्वच्छ वायु में रोग मुक्त हो जायेंगे | 

मक्के की रोटी के संग सरसों का साग बनायेगे । 
बैठ चबारे  बड़े प्रेम से मिलजुल कर हम खायेंगे । 

पॉप सोंग का शोर नहीं वहां लोकगीत की धुन होगी । 
कर्कश ड्रम की बीत नहीं वह पायल की रुनझुन होगी । 

रम्भा-समभा छोड़ वह पर भांडे गिद्दे पाएंगे । 
अपनों के संग झूमेंगे नाचेंगे ख़ुशी मनाएंगे । 

अपनी उन यादो से अब में दूर नहीं रह पाऊँगी । 
मैं तो वापस जाउंगी बस मैं तो वापस जाउंगी । 

पतिवर बोले प्रिय तुम्हारा सुन्दर है यह सपना । 
पर वो मंजर छूट चुका है जो था तुम्हारा अपना ॥ 

चमक दमक माना  शहरों की सबको बहुत लुभाती है ।    
पर बूड़े बरगद की हमको याद बहुत ही आती है । 

मेरे प्यारे सखा बन्धुओ इतनी अरज हमारी है । 
उस धरती को मत त्यागो वो धरती सबसे प्यारी है । 

मेरी प्रियतमा

                               मेरी प्रियतमा 

अरी प्रियतमा तुम मेरी कविताओं का श्रंगार हो |
जिससे मन के भाव प्रकट हो ऐसी तुम उदगार हो |

भाव भी हैं क्षमता भी है पर तुम ही नहीं तो रचना क्या ?
तुम तो एक अवलंब हो प्रिय तुम बिन काव्य सृजना क्या ?
तुम ही मेरी जीवन दाई तुम ही मेरा प्यार हो |
अरी प्रियतमा तुम मेरी कविताओं का श्रंगार हो |

जब भाव उठे लेखनी चली और रचना एक नवीन हुई |
तब अंतर मन हो उठा मुदित तुम उर भावो में लीन हुई|
मेरी कविता की सतह पटल मेरे स्वर का संसार हो |
अरी प्रियतमा तुम मेरी कविताओं का श्रंगार हो |

तुमने ही किया है क्रिया शील मेरे इस निष्क्रिय जीवन को |
कविता लिखना सिखलाया है मेटा मेरे सूनेपन को |
जीवन रंग मंच की तुम ही सूत्रधार साकार हो |
अरी प्रियतमा तुम मेरी कविताओं का श्रंगार हो |

माधुर्य है तुममे मधु जैसा सरसित फूलों सी कोमलता |
गाम्भीर्य है तुम में सागर सा लहरों जैसी है चंचलता |
रूकती नहीं कहीं पर भी तुम ऐसी अविरल धार हो |
अरी प्रियतमा तुम मेरी कविताओं का श्रंगार हो |

तुम सर्वोपरि हो सुंदर हो जैसे मस्तक पर बिंदी हो |
तुम ही मेरी प्रियतमा ओ परम प्रिय तुम हिंदी हो |
तुम अभिवयक्ति की भाषा हो तुम शब्दों का भण्डार हो |
अरी प्रियतमा तुम मेरी कविताओं का श्रंगार हो | 
जिससे मन के भाव प्रकट हो ऐसी तुम उदगार हो |

Wednesday, 31 July 2013

कुर्सी की खातिर

सत्ता लोलुप लोगो माँ का कब तक अपमान करोगे
कुर्सी की खातिर कब तक हमको कुर्बान करोगे

वो खून हमारा करते हें शह तुम्हारी पाके
वो जेलों  मे हें पलते शाही बिरयानी खाके    
इन राज्द्रोहियो का तुम कब तक सम्मान करोगे
कुर्सी की खातिर कब तक हमको कुर्बान करोगे

शांति की उस नगरी मे जब होते रहे धमाके
तुम सोते रहे भवन मे परदे रेशमी गिराके
जागो प्यारे मनमोहन कब तक आराम करोगे
कुर्सी की खातिर कब तक हमको कुर्बान करोगे

तुम चाहो तो इक पल मे उन्हें हरा सकते हो
इन आतंकी चूहों को धुल चटा सकते हो
अपने कर्तव्यो का कब तक ध्यान करोगे
कुर्सी की खातिर कब तक हमको कुर्बान करोगे

................श्यामा अरोरा


मैं कश्ती तू पतवार प्रिय |



तू मांझी  मैं मंझधार प्रिय |







तुम वित्तमंत्री बन जाना |

मैं गृहमंत्री बन जाऊँगी |

तुम मेरे स्वप्न सजा देना |

मैं तेरा घर महका दूंगी |

पूरा होगा परिवार प्रिय | 

तू मांझी मैं मंझधार प्रिय 



तुम खूब कमा कर घर आना |

मैं शोपिंग लिस्ट थमा दूंगी |



भूले से भी जो मना किया |

मायके वाले बुलवा लूंगी |

ये धमकी नहीं मनुहार प्रिय |

तू मांझी मैं मंझधार प्रिय 




जो कभी रूठ तुमसे जाऊं |

दे साडी मुझे मना लेना |

जो थक जाऊं मैं कभी |

तो खाना बाहर से मंगवा लेना |

ये कर लो तुम स्वीकार प्रिय |

तू मांझी मैं मंझधार प्रिय 







तुम सामने मेरे बैठ प्रिय|

 बस मेरी तारीफे करना |

न इधर उधर तुम देख कभी |

ठंडी ठंडी आहें भरना |

वर्ना ...........



तू मांझी मैं मंझधार प्रिय 



जीना होगा दुश्वार प्रिय |

तू मांझी मैं मंझधार प्रिय 






इस खट्टी मीठी नोक झोक |

में प्यार सदा बढता जाए |

तुझ पर मेरा मुझ पर तेरा |

यूँ रंग सदा चदता  जाए |

तुम हो मेरा संसार प्रिय |

तू मांझी मैं मंझधार प्रिय 

Tuesday, 30 July 2013

माँ शारदा वन्दन





अम्ब शारदे वंदन तेरा 
हम करते अभिनन्दन तेरा 

दर पर आये है हम भिखारी 
पूरी कर दो आशा हमारी 
सुन लो करुण यह क्रंदन मेरा 
हम करते अभिनन्दन तेरा 
अम्ब शारदे वंदन तेरा

माँ मुझको वीणा का स्वर दो 
मेरा राग अमर माँ कर दो 
मस्तक कर दो चन्दन मेरा 
हम करते अभिनन्दन तेरा 
अम्ब शारदे वंदन तेरा


गीत तुम्हारे लिखती जाऊ 
मईया तुमसे यह वर पाऊ 
खिला  रहे मन नंदन मेरा 
हम करते अभिनन्दन तेरा 
अम्ब शारदे वंदन तेरा

उर में मेरे भाव समा दो 
श्वास श्वास में सुर बिखरा दो 
कहे ह्रदय स्पंदन मेरा 
हम करते अभिनन्दन तेरा 
अम्ब शारदे वंदन तेरा

Monday, 25 March 2013

गुरु   के चरणों में मिलता है ,चारो तीरथ का आभास ।
सारे जग में घोर अँधेरा गुरु के दर उजला परकाश ॥
 ज्ञान मिले सतगुरु के दर से गुरु गोविन्द से ऊँचा  है।
ब्रह्मा विष्णु और शंकर भी करते गुरु की पूजा हैं ॥
गुरु चरण की पावन  धूलि कर दे सब पापों का नाश ।
सारे ..................................................................॥
हम अज्ञानी नीच अधम हैं ,गुरु ज्ञान की गंगा है ।
भव सागर से पर वो तरता जो गुरु के रंग रंगा है ॥
गुरु की शरनी मिल जाये तुझ को कर बन्दे ऐसा प्रयास ।
सारे .................................................................॥