Wednesday, 12 October 2016

ताल ठोक कर कह रहे,हम तो पूछें भाइ
सब दल के नेताओं का,पैनल दिया बिठाइ
पैनल दिया बिठाइ,खूब वे शोर मचावें
एक दूसरे पर बड़,चड़ आरोप लगावें
ऐसे फाडे गला,श्वान ज्यूँ गये भौंक के
टी आर पी भी खूब,मिल गई ताल ठोक के
श्यामा अरोरा

Monday, 3 October 2016

लघू नाटिका वृद्धाश्रम

पात्र
रीना ( आधुनिक बहू)
अशोक (रीना का पति)
चिंटू(रीना का 4 वर्ष का पुत्र )
रीना की 6 सखियाँ
रीना की सास
वृद्धाश्रम मे बुजुर्ग
वृद्धाश्रम का प्रबंधक
प्रथम दृश्य (किट्टी पार्टी)
ड्राइंग रूम मे रीना व उसकी सखियाँ बैठ कर बातें कर रही हैं
पहली सखी -यार ये सासें भी कितनी पकाऊ होती हैं हर बात मे रोक टोक
ये मत पहनो वो मत खाओ यहाँ मत जाओ वहाँ मत जाओ
दूसरी सखी- सच यार मुझे तो मेरी सास बिल्कुल अच्छी नहीं लगती
तीसरी सखी - यार मेरा बस चले तो आज ही उन्हे वृद्धाश्रम भेज दूँ
चौथी सखी - पर ये पतिदेव लोग माने तब ना
हाहाहाहाहा सभी जोर जोर से हँसती हैं
तभी रीना कोल्ड ड्रिंक लेकर ड्राइंग रूम मे प्रवेश करती है
रीना - क्या बातें हो रही हैं सखियों?
पाँचवी सखी - अपनी अपनी सासों के गुणगान हो रहे हैं  तुम भी कुछ बताओ अपनी  सासके बारे में
रीना - अरे सखी अब क्या बताऊँ मैं तो खुद परेशान हूँ दिनभर टोका टाकी करते रहती  हैं
खाँस खाँस कर दिन भर परेशान करती रहेंगी और जबान इतनी चटोरी कि पूछो मत मैं तो अपने चिन्टू को भी उनसे दूर ही रखती हूँ पर वो मानता ही नहीं
छटी सखी - अरे रीना एक बात बताओ हमेशा तो कोल्ड ड्रिंक माँजी ही सर्व करती हैं आज तुम खुद कैसे लायी?
रीना - अरे यार आज बुडिया पास के मंदिर मे गयी हैं सत्संग मे
सभी सखियां ओह चलो अच्छा है lets enjoy
यार म्यूजिक चालू करो कुछ डाँस वांस हो जाये
सभी संगीत की धुन पर नाचने लगते हैं
दूसरा दृश्य
 रीना की सास बाहर आँगन मे बैठी है
रीना - माँजी मैं जरा बाहर जा रही हूँ शोपिंग के लिये
सास - बहू खाना बना दिया है ना
रीना - ( तुनक कर) माँजी हद है आपकी भी मुझे बाहर जाना है आपको तो हर समय खाने की ही पडी रहती है कुछ भी बना खा लेना नहीं तो मंदिर मे भंडारा हो रहा है वहीं चले जाना
रीना पर्स हिलाती हुई शोपिंग करने चली जाती है
थोडी देर बाद चिंटू स्कूल से आता है
चिंटू - दादी दादी मेरी प्यारी ( अपनी दादी के गले लग जाता है ) दादी बहुत जोर की भूख लगी है कुछ खाने को दो ना
दादी - आ मेरा राजा बेटा क्या खायेगा ?
चिंटू - कुछ भी अच्छा सा बनादो ना
दादी दर्द मे कराहती हुई रसोई मे जाती है खाना बनाते समय कढाई गिर जाती है और रसोई मे पूरा खाना फैल जाता है
तभी रीना घर मे प्रवेश करती है रसोई की हालत देख कर चिल्लाते हुए बोलती है
रीना - ये क्या किया माँजी ? आपको भी बस हर समय खाना चाहिये बोला तो था मंदिर मे खा लेना
सास - अरे! बहू चिंटू को बहुत भूख लगी थी उसके लिये खाना बना रही थी
रीना - आप तो रहने ही दो माँजी  चिंटू तो बहाना है आपकी खुद की जबान पर  तो आपको कंट्रौल है नहीं और मेरे बेटे से जरा दूर ही रहा करो उसका ध्यान मैं खुद रख सकती हूँ आओ चिंटू बेटा देखो तुम्हारे लिये चायनीज फूड लायी हूँ तुम्हारा फेवरिट
रीना चिंटू को लेकर अपने कमरे मे चली जाती है
सास की आँखों से आँसू बह निकलते हैं
सास - हे भगवान मैने ऐसा क्या पाप किया है? जो आज बुढापे मे मुझे अपनी बहू की झिड़कें सहनी पड रहीं हैं
तभी अशोक (रीना का पति ) घर मे प्रवेश करता है माँ को रोते हुए देख कर पूछता है
अशोक - माँ क्या हुआ ? तुम रो क्यों रही हो?
माँ - कुछ नहीं बेटा बस यूँही
अशोक - नहीं माँ मुझे बताओ
माँ - वो बहू ------------------
माँ की बात पूरी भी नहीं हुई कि अचानक रीना गुस्से मे कमरे से बाहर आयी और चीखने लगी
रीना - हाँ हाँ अब यही कसर तो रह गयी थी अब अपने बेटे से मेरी चुगली भी कर रही हो
सास - नहीं बहू मैं तो----------------------
रीना - आप तो चुप ही रहो
पति की तरफ़ देखते हुए
देखिये जी बहुत हुई खिटपिट मैं तो रोज रोज के झगडो से तंग आ चुकी हूँ
आज तो फ़ैसला हो ही जाय
अशोक (रीना को शांत कराते हुए) अरे डार्लिंग इतना गुस्सा मत करो चलो शांति से बात करते हैं ( कमरे मे ले जाता है)
तीसरा दृश्य

कमरे मे पति पत्नि बात करते हुए
अशोक - अब मुझे तसल्ली से बताओ  क्या बात है
रीना ( अपने झूठे आँसू गिराती हुई) देखो जी माँजी मुझे बहुत परेशान करती हैं हर समय टोका टाकी करती रहती हैं आज पूरी रसोई बिखरा दी पता नहीं कौन से जन्म का बदला ले रहीं हैं मुझसे
अशोक - नहीं डार्लिंग ऐसा नहीं है वो तो बहुत अच्छी हैं थोडी उम्र ज्यादा हो गयी है इसलिये कभी कभी ऐसा हो जाता है
रीना -(चिल्लाते हुए) हाँ हाँ मैं तो झूठ बोल रही हूँ आप को तो अपनी माँ ही सच्ची लगती है मेरी तो कोई परवाह ही नहीं किसी को इस घर मे सारा दिन खटती रहती हूँ पर फिर भी मैं ही बुरी हूँ (रूठ जाती है )
अशोक - (रीना को मनाते हुए) रीना रीना अरे सुनो तो बेबी ऐसा नहीं है यार आई लव यू सो मच
रीना - तो ठीक है साबित करो
अशोक - कैसे साबित करूँ बताओ जो तुम कहोगी वो करूँगा
रीना- पक्का
अशोक - हाँ बाबा पक्का करूँगा
रीना - तो अपनी माँ को मेरी जिन्द्गी से दूर ले जाओ
अशोक - प्रिय वो माँ हैं कोई सामान नहीं जिसे जब चाहा प्रयोग किया और पुराना हुआ तो उठा कर फेंक दिया पिता जी के जाने के बाद उन्होने मुझे बडे कष्ट झेल कर पालापोसा है और आज इस कामयाबी तक पहुँचाया है मैं ऐसा नहीं कर सकता
रीना पर तो मानो जुनून ही सवार हो गया था वो अशोक की एक बात भी सुनने को तैयार नहीं थी
रीना - तुमने प्रोमिस किया है अशोक अब मेरा फ़ैसला भी सुन लो इस घर मे या तो मैं रहूँगी या तुम्हारी माँ !
बेचारा अशोक  बडे ही धर्मसंकट मे फँस गया कि माँ का साथ दे या पत्नि का
आखिर बहुत सोचने के बाद उसने रीना को कहा
अशोक - सुनो डार्लिंग मैं तुम सुबह माँ से माफी माँग लेना
रीना - ( तुनक कर ) मैं क्यों माफी माँगू मुझसे ऐसी उम्मीद मत रखना मैं कल सुबह ही अपने मायके जा रही हूँ
अशोक - देखो प्रिय यदि तुम माँ से छुटकारा पाना चाहती हो तो तुम्हे माफ़ी माँगनी पडेगी मेरे पास एक योजना है (रीना के कान मे फुसफुसा कर योजना बताता है )
योजना सुन कर रीना खुशी से उछल पड़ती है
रीना -(खुशी से अशोक को गले लगा कर) अशोक आई लव यू टू डार्लिंग
चतुर्थ दृश्य
ड्राइंग रूम मे पति पत्नि बैठे हैं माँ मंदिर से आयी तो बेटा बहू ने खूब हँस कर माँ का स्वागत किया रीना ने तो पैरों मे पड़कर माफी भी माँग ली
रीना - मुझे माफ कर दो माँजी आगे से आपसे कभी ऊँची आवाज मे भी बात ना करूँगी
माँ -( खुश होते हुए डेरों आशीर्वाद देते हुए)  जुग जुग जिओ बहू रानी हमेशा खुश रहो
अशोक - माँ आप की बहुत दिनो से चारधाम जाने की इच्छा थी ना तो हमने जाने का कार्यक्रम बना लिया है आप अपना सारा सामान बाँध लो
माँ - जुग जुग जी मेरे लाल
बच्चों को आशीष देती हुई माँ अपने कमरे मे खुशी खुशी सामान बाँधने चली जाती है
सभी चारधाम की यात्रा को निकल पड़ते हैं ( अब मंदिरों की झलकियाँ दिखानी हैं )
घूमते  घूमते एक दिन अशोक माँ को एक आश्रम मे ले गया और माँ से बोला
अशोक - माँ तुम यहाँ कुछ देर आराम करो मैं थोडी देर मे आता हूँ
माँ - बेटा तुम मुझे ये कहाँ ले आये हो
अशोक - माँ ये आश्रम है यहाँ तुम्हारा पूरा ध्यान रखा जायेगा तुम यहीं रुको मैं जल्दी ही आ जाऊँगा
कह कर अशोक तुरंत ही वहाँ से चला गया माँ रास्ता देखती रही बेटा नहीं आया
पाँचवां दृश्य वृद्धाश्रम

वृद्धाश्रम मे बहुत सारे बुजुर्ग हैं कोई बैठा है कोई लेटा है कोई टहल रहा है
माँ अपने बेटे की प्रतीक्षा मे बेचैन सी इधर उधर घूम रही है
पहला वृद्ध - क्या हुआ बहन ? इतनी बेचैन क्यों हो
माँ - मेरा बेटा आने वाला है उसी की राह देख रही हूँ
दूसरा वृद्ध - अरी बहन ! क्यों खुद को झूठी आशा दे रही हो यहाँ कोई बेटा वापस नहीं आता अपने माँ बाप को लेने
माँ - नही नहीं ऐसा न कहो मेरा बेटा ऐसा नहीं है
तीसरा वृद्ध - अरे ! अगर वो ऐसा नहीं है तो तुम्हे यहाँ छोड़ कर ही क्यों गया
माँ - अरे उसे कोई जरुरी काम था बोला निपटा के आता हूँ
चौथा वृद्ध - बहन वो तुमसे झूठ बोल कर तुम्हे यहाँ छोड़ गया हमेशा के लिये
माँ - मेरा बेटा मेरे साथ ऐसा कभी नहीं करेगा
सभी वृद्ध एक स्वर मे बहन हमे भी ऐसा ही लगता था पर यही सच्चाई है
पाँचवी वृद्ध - सुनो बहन तुम अपने बेटे को फोन करके देख लो शायद बात हो जाये
माँ - ये सही है

-वृद्धाश्रम के प्रबंधक के पास जाती है
माँ - बेटा मेरे बेटे को एक फोन तो लगादे
प्रबंधक - no बोलो माँजी
माँ no बोलती है प्रबंधक फोन मिलाता है
प्रबंधक - माँजी आपका बेटा थोडा व्यस्त है बोल रहा है बाद मे बात करूँगा
ऐसे ही कई दिन निकल जाते हैं माँ रोज फोन मिलाती है बेटा बात नहीं करता
अब तो रोज रोज फोन मिला कर प्रबंधक भी परेशान हो गया
माँ - बेटा फोन मिला दे
प्रबंधक -( डाँटते हुए) क्या है माँजी रोज रोज फोन मिलाने आ जाती हो नहीं आयेगा तुम्हारा बेटा
माँ - वो आयेगा मेरा बेटा आयेगा जरुर आयेगा (बुदबुदाती हुई)
रोज के इसी सिलसिले मे बेटे के आने की प्रतीक्षा मे बूढी माँ एक चल बसी
वृद्धाश्रम से अशोक  को फोन गया कि आपकी माँ अब इस दुनिया मे नहीं रही
अशोक आया माँ का शव ले जाने लगा तो माँ के हाथ मे एक पर्ची थी बेटे ने पर्ची खोल कर देखी उसमे लिखा था
मेरा बेटा दुनिया का सबसे अच्छा बेटा है वो मुझे बहुत प्यार करता है वो मुझे लेने जरुर आयेगा
अशोक की आँखों से आँसू बह निकले वो जोर जोर से रोने लगा और अपनी माँ से क्षमा माँगने लगा
माँ मुझे माफ कर दो मुझसे बहुत बडी गलती हो गयी

पर अब पछ्ताय होत का जब चिडियाँ चुग गयी खेत

Tuesday, 22 December 2015

सैनिक की पत्नि अपनी सखी से
अपनी व्यथा कहती है
सुन आलि सावन की बूँदे,विरह अगन भड़काती हैं
घायल जियरा हूक उठे,जब याद पिया की आती है
चले गये सीमा पर लड़ने,मुझे अकेला छोड़ गये
बीता बरस नाआयेमिलने,आशा मेरी तोड़ गये
होली के रंग उन बिन फीके,सूनी रात
दीवाली की
मेहन्दी का भी रंग चढा ना,गयी
तीज हरियाली भी
काजल बिन्दिया कंगन झुमके,नित सोलह श्रिन्गार करूँ
दरवाजे पर बैठ दिवस निशि,ठंडी ठंडी आह भरुं
ग्रीष्म शरद हेमंत शिशिर,ऋतुयेँ अबअब अब मुझको भायें ना
मौसम आये चले गये पर ,साजन मेरे आये ना
अब तो आंखोँ के आँसू भी डुलक डुलक कर सूख गये
ऐसा क्या अपराध हुआ जो भाग्य हमारे रूठ गये
रोम रोम मेरा पिया पुकारे. पल पल उनको याद करूँ
एक बार पिया मिलन करादो, रब से ये फ़रियाद करूँ
प्रियतम तो आये नाआलि,पाती उनकी आयी है
पाती मे प्रियतम ने अपने, दिल की व्यथा सुनाई है
प्रिया तेरे बिन इक इक पल,बरसों के मुझे समान लगे
तुझसे मिलने की आस लिये,नैना मेरे दिन रात जगे
तेरे कुसुमित अलकों की महक,की याद मुझे
तड़पाती है
छूना उन सुर्ख कपोलों को ,सिहरन मन मे उठ जाती है
तेरे अधरों की लाली को,बिन्दिया ,कुमकुम को याद करूँ
कंगन खनके पायल छनके
तेरी छवि से दिल आबाद करूँ
मैं जल्दी मिलने आऊँगा ,तुम जरा निराश नहीं होना
तुम ही तो मेरी शक्ति हो,अस्तित्व ना तुम अपना खोना
मेरे भारत की सीमा पर ,दुश्मन ने हमला बोला है
नफ़रत का जहर फिजाओं मे,दुष्टो ने फ़िर से घोला है
उनसे मै दो दो हाथ करूँ,जरा सबक उसे सिखलाऊँ तो
भारत माँ का मैं वीर लाल ,उसकी औकात बताऊँ तो
दुश्मन का शीश काट मुझको,माँ के चरणो मे चढाना है
हाथों मे लिये तिरंगा,वन्दे मातरम कहते जाना है
भारत की पावन भूमि पर ,जब चारों ओर अमन होगा
उस दिव्य समय मे प्रिय तुम्हारा मेरा मधुर मिलन होगा
यदि मैं शहीद हो जाऊँ तो,दुख तुमको नही मनाना है
मुझे विदा शान से करना ,वन्दे मातरम कहते जाना है
श्यामा अरोरा

Monday, 14 October 2013

अपना प्यारा गावं

महंगाई की देख दशा मन हुआ बहुत परेशान | 
अपने  प्रियवर से मै बोली सुनिए तो श्रीमान | 

छोड़ चमक दिल्ली की आओ लौटे अपने गॉव | 
यहाँ धूप  कंक्रीटो की वहां ठंडी नीम की छावं | 

मिटटी का वहां चूल्हा होगा और हांड़ी की भाजी | 
थैली  वाला दूध नहीं फल सब्जी होगी ताज़ी | 

गोमाता पालेंगे होगा दूध दही भरपूर | 
सदा जीवन होगा होंगे आडम्बर से दूर । 

अपने छोटे से आगन में फल सब्जिया उगायेंगे । 
लेकर सांस स्वच्छ वायु में रोग मुक्त हो जायेंगे | 

मक्के की रोटी के संग सरसों का साग बनायेगे । 
बैठ चबारे  बड़े प्रेम से मिलजुल कर हम खायेंगे । 

पॉप सोंग का शोर नहीं वहां लोकगीत की धुन होगी । 
कर्कश ड्रम की बीत नहीं वह पायल की रुनझुन होगी । 

रम्भा-समभा छोड़ वह पर भांडे गिद्दे पाएंगे । 
अपनों के संग झूमेंगे नाचेंगे ख़ुशी मनाएंगे । 

अपनी उन यादो से अब में दूर नहीं रह पाऊँगी । 
मैं तो वापस जाउंगी बस मैं तो वापस जाउंगी । 

पतिवर बोले प्रिय तुम्हारा सुन्दर है यह सपना । 
पर वो मंजर छूट चुका है जो था तुम्हारा अपना ॥ 

चमक दमक माना  शहरों की सबको बहुत लुभाती है ।    
पर बूड़े बरगद की हमको याद बहुत ही आती है । 

मेरे प्यारे सखा बन्धुओ इतनी अरज हमारी है । 
उस धरती को मत त्यागो वो धरती सबसे प्यारी है । 

मेरी प्रियतमा

                               मेरी प्रियतमा 

अरी प्रियतमा तुम मेरी कविताओं का श्रंगार हो |
जिससे मन के भाव प्रकट हो ऐसी तुम उदगार हो |

भाव भी हैं क्षमता भी है पर तुम ही नहीं तो रचना क्या ?
तुम तो एक अवलंब हो प्रिय तुम बिन काव्य सृजना क्या ?
तुम ही मेरी जीवन दाई तुम ही मेरा प्यार हो |
अरी प्रियतमा तुम मेरी कविताओं का श्रंगार हो |

जब भाव उठे लेखनी चली और रचना एक नवीन हुई |
तब अंतर मन हो उठा मुदित तुम उर भावो में लीन हुई|
मेरी कविता की सतह पटल मेरे स्वर का संसार हो |
अरी प्रियतमा तुम मेरी कविताओं का श्रंगार हो |

तुमने ही किया है क्रिया शील मेरे इस निष्क्रिय जीवन को |
कविता लिखना सिखलाया है मेटा मेरे सूनेपन को |
जीवन रंग मंच की तुम ही सूत्रधार साकार हो |
अरी प्रियतमा तुम मेरी कविताओं का श्रंगार हो |

माधुर्य है तुममे मधु जैसा सरसित फूलों सी कोमलता |
गाम्भीर्य है तुम में सागर सा लहरों जैसी है चंचलता |
रूकती नहीं कहीं पर भी तुम ऐसी अविरल धार हो |
अरी प्रियतमा तुम मेरी कविताओं का श्रंगार हो |

तुम सर्वोपरि हो सुंदर हो जैसे मस्तक पर बिंदी हो |
तुम ही मेरी प्रियतमा ओ परम प्रिय तुम हिंदी हो |
तुम अभिवयक्ति की भाषा हो तुम शब्दों का भण्डार हो |
अरी प्रियतमा तुम मेरी कविताओं का श्रंगार हो | 
जिससे मन के भाव प्रकट हो ऐसी तुम उदगार हो |

Wednesday, 31 July 2013

कुर्सी की खातिर

सत्ता लोलुप लोगो माँ का कब तक अपमान करोगे
कुर्सी की खातिर कब तक हमको कुर्बान करोगे

वो खून हमारा करते हें शह तुम्हारी पाके
वो जेलों  मे हें पलते शाही बिरयानी खाके    
इन राज्द्रोहियो का तुम कब तक सम्मान करोगे
कुर्सी की खातिर कब तक हमको कुर्बान करोगे

शांति की उस नगरी मे जब होते रहे धमाके
तुम सोते रहे भवन मे परदे रेशमी गिराके
जागो प्यारे मनमोहन कब तक आराम करोगे
कुर्सी की खातिर कब तक हमको कुर्बान करोगे

तुम चाहो तो इक पल मे उन्हें हरा सकते हो
इन आतंकी चूहों को धुल चटा सकते हो
अपने कर्तव्यो का कब तक ध्यान करोगे
कुर्सी की खातिर कब तक हमको कुर्बान करोगे

................श्यामा अरोरा


मैं कश्ती तू पतवार प्रिय |



तू मांझी  मैं मंझधार प्रिय |







तुम वित्तमंत्री बन जाना |

मैं गृहमंत्री बन जाऊँगी |

तुम मेरे स्वप्न सजा देना |

मैं तेरा घर महका दूंगी |

पूरा होगा परिवार प्रिय | 

तू मांझी मैं मंझधार प्रिय 



तुम खूब कमा कर घर आना |

मैं शोपिंग लिस्ट थमा दूंगी |



भूले से भी जो मना किया |

मायके वाले बुलवा लूंगी |

ये धमकी नहीं मनुहार प्रिय |

तू मांझी मैं मंझधार प्रिय 




जो कभी रूठ तुमसे जाऊं |

दे साडी मुझे मना लेना |

जो थक जाऊं मैं कभी |

तो खाना बाहर से मंगवा लेना |

ये कर लो तुम स्वीकार प्रिय |

तू मांझी मैं मंझधार प्रिय 







तुम सामने मेरे बैठ प्रिय|

 बस मेरी तारीफे करना |

न इधर उधर तुम देख कभी |

ठंडी ठंडी आहें भरना |

वर्ना ...........



तू मांझी मैं मंझधार प्रिय 



जीना होगा दुश्वार प्रिय |

तू मांझी मैं मंझधार प्रिय 






इस खट्टी मीठी नोक झोक |

में प्यार सदा बढता जाए |

तुझ पर मेरा मुझ पर तेरा |

यूँ रंग सदा चदता  जाए |

तुम हो मेरा संसार प्रिय |

तू मांझी मैं मंझधार प्रिय